
*पितृ-पक्ष में ये उपाय करने से कल्याण होता है* 1....

*पितृ-पक्ष में ये उपाय करने से कल्याण होता है* 1.श्राद्ध के दिन भगवद गीता के सातवें अध्याय का माहात्मय पढ़कर फिर पूरे अध्याय का पाठ करना चाहिए एवं उसका फल मृतक आत्मा को अर्पण करना चाहिए। 2.अगर पंडित से श्राद्ध नहीं करा पाते तो सूर्य नारायण के आगे अपने बगल खुले करके (दोनों हाथ ऊपर करके) बोलें : "हे सूर्य नारायण ! मेरे पिता (नाम), अमुक (नाम) का बेटा, अमुक जाति (नाम), (अगर जाति, कुल, गोत्र नहीं याद तो ब्रह्म गोत्र बोल दे) को आप संतुष्ट/सुखी रखें । इस निमित मैं आपको अर्घ्य व भोजन करता हूँ ।" ऐसा करके आप सूर्य भगवान को अर्घ्य दें और भोग लगायें । 3.श्राद्ध पक्ष में १ माला रोज द्वादश मंत्र " ॐ नमो भगवते वासुदेवाय " की करनी चाहिए और उस माला का फल नित्य अपने पितृ को अर्पण करना चाहिए। 4.श्राद्ध कर्म करते समय जो श्राद्ध का भोजन कराया जाता है, तो ११.३६ से १२.२४ तक उत्तम काल होता है l 5. गौशाला में, देवालय में और नदी तट पर श्राद्ध करना श्रेष्ठ माना गया है l 6.सोना, चांदी, तांबा और कांसे के बर्तन में अथवा पलाश के पत्तल में भोजन करना-कराना अति उत्तम माना गया है l लोहा, मिटटी आदि के बर्तन काम में नहीं लाने चाहिए l 7.श्राद्ध के समय अक्रोध रहना, जल्दबाजी न करना और बड़े लोगों को या बहुत लोगों को श्राद्ध में सम्मिलित नहीं करना चाहिए, नहीं तो इधर-उधर ध्यान बंट जायेगा, तो जिनके प्रति श्राद्ध सद्भावना और सत उद्देश्य से जो श्राद्ध करना चाहिए, वो फिर दिखावे के उद्देश्य में सामान्य कर्म हो जाता है l 8.अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रांति, चतुर्दशी व अष्टमी, रविवार, श्राद्ध और व्रत के दिन स्री – श्वास एवं तिल का तेल खाना व लगाना निषिद्ध है | 9.सफ़ेद सुगन्धित पुष्प श्राद्ध कर्म में काम में लाने चाहिए l लाल, काले फूलों का त्याग करना चाहिए l 10.गीताजी का पूरा पाठ ब्राह्मण द्वारा या स्वयं करके गीताजी के पाठ के पुण्य फल को अपने पितरों(पूर्वजों) को देने से भी कल्याण होता है। 11.किसी मंदिर के परिसर में पीपलअथवा बड़ का वृक्ष लगाएं और रोज़ उसमें जलडालें , उसकी देख -भाल करें , जैसे-जैसे वृक्षफलता -फूलता जाएगा, पितृ -दोष दूर होता जाएगा, क्योकि इनवृक्षों पर ही सारे देवी -देवता , इतर -योनियाँ , पितर आदि निवास करते हैं | 12.घर में कुआं हो या पीनेका पानी रखने की जगह हो , उसजगह की शुद्धता का विशेष ध्यान रखें, क्योंके ये पितृस्थान माना जाता है | इसके अलावा पशुओं के लिएपीने का पानी भरवाने तथा प्याऊ लगवानेअथवा आवारा कुत्तों को जलेबी खिलाने सेभी पितृ दोष शांत होता है| लेकिनकिसी भी प्रयोगकी सफलता आपकी पितरों केप्रति श्रद्धा के ऊपर निर्भर करती है| ।। श्रीहरि:।। ८.चतुर्दशी को श्राद्ध नहीं करना चाहिये । जो चतुर्दशी को श्राद्ध करता है, उसके घर में नवयुवकों की मृत्यु होती है तथा श्राद्ध करनेवाला स्वयं भी युद्ध का भागी होता है ।* ८. पितृपक्षे चतुर्दश्यां यः श्राद्धं कुरुते नरः । सन्ततिस्तु हनिष्यन्ति विनाशस्त्रहते मृते ।। श्राद्धं दानं चतुर्दश्यां विना शस्त्रनिपातने । ज्येष्ठपुत्रो विनश्यति पितृणां वा अधोगति: ।। ( ब्रह्मोक्त याज्ञवल्क्यसंहिता ५ । २१-२२ ) अवश्यं तु युवानोऽस्य प्रमीयन्ते नरा गृहे ।। युद्धभागी भवेन्मर्त्यः कुर्वञ्छ्राद्धं चतुर्दशीम् । ( महाभारत, अनु० ८७ । १६-१७) * जिनकी मृत्यु शस्त्र से न होकर स्वाभाविक ही चतुर्दशी को हुई हो, उनका श्राद्ध दूसरे दिन (अमावस्या को) करना चाहिये । 'क्या करें, क्या न करें ? ( आचार-संहिता )' पुस्तक से, विषय- पितृकार्य ( श्राद्ध-तर्पण ), पृष्ठ-संख्या- २०५, गीता प्रकाशन, गोरखपुर परमश्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदास जी महाराज। ।। श्रीहरि:।। ७. चतुर्दशी को श्राद्ध करने से कुप्रजा ( निन्दित सन्तान ) पैदा होती है । परन्तु जिसके पितर युद्ध में शस्त्र से मारे गये हों, वे चतुर्दशी को श्राद्ध करने से प्रसन्न होते हैं । ७. 'चतुर्दश्यां तु कुप्रजाः' ( कूर्मपुराण, उ० २० । २१ ) तस्माच्छ्राद्धं न कर्तव्यं चतुर्दश्यां द्विजातिभिः । शस्त्रेण तु हतानां वै तत्र श्राद्धं प्रकल्पयेत् ।। ( कूर्मपुराण, उ० २० । २२ ) प्रतिपत्प्रभृतिष्वेतान् वर्जयित्वा चतुर्दशीम् । शस्त्रेण तु हता ये वै तेभ्यस्तत्र प्रदीयते ।। ( याज्ञवल्क्यस्मृति १ । २६४ ) प्रतिपत्प्रभृतिहोतद्वज्र्जयित्वा चतुर्दशीम् । शस्त्रेण तु हता ये वै तेषां श्राद्धं प्रदीयते ।। ( ब्रह्मोक्त याज्ञवल्क्यसंहिता ५ । २० ) 'क्या करें, क्या न करें ? ( आचार-संहिता )' पुस्तक से, विषय- पितृकार्य ( श्राद्ध-तर्पण ), पृष्ठ-संख्या- २०५, गीता प्रकाशन, गोरखपुर।
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