
ज्योतिषी ज्ञान :_शिव शक्ति ज्योतिषी इंदौर अशुभ र...
ज्योतिषी ज्ञान :_शिव शक्ति ज्योतिषी इंदौर अशुभ राहु केतु व शनि की वजह से बनते हैं पिशाच बाधा दोष। . करणी, पिशाचबाधा, प्रेत बाधा या किसी अदृश्य शक्ति से परेशानी को कैसे पहचाने ? यह भी एक यक्ष प्रश्न ही हे क्यों की साधारण व्यक्ति के बस की बात नहीं हे जान लेना और ऐसे वह या तो परेशान होते रहता हे या फिर अंधे की तरह इधर उधर भटकता हे ऐसे जो जेसा कहता हे वैसा वह करता रहता हे जिससे समय व धन का तो अपव्यय होता ही हे साथ ही तकलीफ भी बढ़ती रहती हे और साथ ही लगातार मिलने वाली असफलता से श्रृद्धा भी चरमराने लग जाती हे | इन सब बातो के कुछ लक्षण शास्त्रों में कहे गए हे जो अनुभब की कसौटी पर खरे उतरते हे जिन्हें पहचान कर हम अपने तकलीफों का ना केवल समझ सकते हे बल्कि उनके लिए कारगर उपाय कर उनसे निजात भी पा सकते हे| आइये जाने सर्व साधारण लक्षण और उनके लिए सर्व साधारण उपाय | लक्षण =- १.लगातार एक जैसी उबासी आना या जम्हाई लेना, शरीर में हमेशा सुस्ती रहना | २.घर में से वस्तुए अचानक अपने आप गायब होना ...या बरकत जाना ..सामान ख़त्म होना .जल्दी जल्दी ..| ३.घर में सदा ही कलह होना व उदासी छाई रहना | ४. धन ना पुरना याने कम पड़ना और दिन दिन कर्ज बढ़ते रहना और कर्जे में डूब जाना | ५. हाथ पाँव ठन्डे रहना ..उनमे कंप कम्पी होना फिट्स आना ..| ६. कोई अनजान आ कर दहलीज की पूजा कर जाए ..घर में निम्बू , मिर्ची, राइ आ के गिरना, शरीर पर चट्ठे उभरना, वस्त्र पर विचित्र धब्बे आना या जलना .या कटे हुए होना, बालो का अधिक झड़ना या गलना, शरीर पर फोड़े फुंसी होना ..प्रेत पिशाच के सपने अक्सर आना ..| ७.बालो के लट काटी जाना या कपडे या साडी का पल्लू काटा जाना प्रत्यक्ष प्रेत घर में घूमते हुए दिखना या कोई हे ऐसा एहसास सदा होना .| ८.स्त्रियों को मासिक धर्म के दौरान मात्रा से अधिक रक्त स्त्राव होना, तबियत उत्तम होने और ग्रह बाधा ना होने पर भी बार बार गर्भपात होना, नाम चीन वैद्य-हकीम का इलाज करने पर भी रोग में लाभ ना होना, स्वप्न में सर्प, मरे हुए व्यक्ति या विधवा का दिखाई देना | ९. भगवान के प्रति अरुचि होना देव दर्शन से भी मन उचटना | पंडित जी 97555555085 . अक्सर सुनने में आता है कि उसके ऊपर भूत आ गया है या उसको प्रेत ने पकड़ लिया है जिसक कारण उसके घर वाले बहुत परेशान हैं। उसको संभाल ही नहीं पाते हैं। तान्त्रिक, मौलवी या ओझा के पास जाकर भी कुछ नहीं हुआ है। समझ नहीं आता है क्या करें..??? केसे जाने की भूत-प्रेत बाधा है या नहीं..?? आप अपनी या किसी की कुण्डली देखें और यदि ये योग उसमें विद्यमान हैं तो समझ लें कि जातक या जातिका भूत-प्रेत बाधा से परेशान है। भूत-प्रेत बाधा के योग इस प्रकार हैं- पहला योग-कुण्डली के पहले भाव में चन्द्र के साथ राहु हो और पांचवे और नौवें भाव में क्रूर ग्रह स्थित हों। इस योग के होने पर जातक या जातिका पर भूत-प्रेत, पिशाच या गन्दी आत्माओं का प्रकोप शीघ्र होता है। यदि गोचर में भी यही स्थिति हो तो अवश्य ऊपरी बाधाएं तंग करती हैं। दूसरा योग-यदि किसी कुण्डली में शनि, राहु, केतु या मंगल में से कोई भी ग्रह सप्तम भाव में हो तो ऐसे लोग भी भूत-प्रेत बाधा या पिशाच या ऊपरी हवा आदि से परेशान रहते हैं। तीसरा योग-यदि किसी की कुण्डली में शनि-मंगल-राहु की युति हो तो उसे भी ऊपरी बाधा, प्रेत, पिशाच या भूत बाधा तंग करती है। उक्त योगों में दशा-अर्न्तदशा में भी ये ग्रह आते हों और गोचर में भी इन योगों की उपस्थिति हो तो समझ लें कि जातक या जातिका इस कष्ट से अवश्य परेशान है। भूत-प्रेतों की गति एवं शक्ति अपार होती है। इनकी विभिन्न जातियां होती हैं और उन्हें भूत, प्रेत, राक्षस, पिशाच, यम, शाकिनी, डाकिनी, चुड़ैल, गंधर्व आदि विभिन्न नामों से पुकारा जाता है। ज्योतिष के अनुसार राहु की महादशा में चंद्र की अंतर्दशा हो और चंद्र दशापति राहु से भाव ६, ८ या १२ में बलहीन हो, तो व्यक्ति पिशाच दोष से ग्रस्त होता है। वास्तुशास्त्र में भी उल्लेख है कि पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद, ज्येष्ठा, अनुराधा, स्वाति या भरणी नक्षत्र में शनि के स्थित होने पर शनिवार को गृह-निर्माण आरंभ नहीं करना चाहिए, अन्यथा वह घर राक्षसों, भूतों और पिशाचों से ग्रस्त हो जाएगा। इस संदर्भ में संस्कृत का यह श्लोक द्रष्टव्य है : ”अजैकपादहिर्बुध्न्यषक्रमित्रानिलान्तकैः। समन्दैर्मन्दवारे स्याद् रक्षोभूतयुंतगद्यहम॥ भूतादि से पीड़ित व्यक्ति की पहचान उसके स्वभाव एवं क्रिया में आए बदलाव से की जा सकती है। इन विभिन्न आसुरी शक्तियों से पीड़ित होने पर लोगों के स्वभाव एवं कार्यकलापों में आए बदलावों का संक्षिप्त विवरण यहां प्रस्तुत है। भूत पीड़ा : भूत से पीड़ित व्यक्ति किसी विक्षिप्त की तरह बात करता है। मूर्ख होने पर भी उसकी बातों से लगता है कि वह कोई ज्ञानी पुरुष हो। उसमें गजब की शक्ति आ जाती है। क्रुद्ध होने पर वह कई व्यक्तियों को एक साथ पछाड़ सकता है। उसकी आंखें लाल हो जाती हैं और देह में कंपन होता है। यक्ष पीड़ा : यक्ष प्रभावित व्यक्ति लाल वस्त्र में रुचि लेने लगता है। उसकी आवाज धीमी और चाल तेज हो जाती है। इसकी आंखें तांबे जैसी दिखने लगती हैं। वह ज्यादातर आंखों से इशारा करता है। पिशाच पीड़ा : पिशाच प्रभावित व्यक्ति नग्न होने से भी हिचकता नहीं है। वह कमजोर हो जाता है और कटु शब्दों का प्रयोग करता है। वह गंदा रहता है और उसकी देह से दुर्गंध आती है। उसे भूख बहुत लगती है। वह एकांत चाहता है और कभी-कभी रोने भी लगता है। शाकिनी पीड़ा : शाकिनी से सामान्यतः महिलाएं पीड़ित होती हैं। शाकिनी से प्रभावित स्त्री को सारी देह में दर्द रहता है। उसकी आंखों में भी पीड़ा होती है। वह अक्सर बेहोश भी हो जाया करती है। वह रोती और चिल्लाती रहती है। वह कांपती रहती है। प्रेत पीड़ा : प्रेत से पीड़ित व्यक्ति चीखता-चिल्लाता है, रोता है और इधर-उधर भागता रहता है। वह किसी का कहा नहीं सुनता। उसकी वाणी कटु हो जाती है। वह खाता-पीता नही हैं और तीव्र स्वर के साथ सांसें लेता है। चुडैल पीड़ा : चुडैल प्रभावित व्यक्ति की देह पुष्ट हो जाती है। वह हमेशा मुस्कराता रहता है और मांस खाना चाहता है। भूत प्रेत कैसे बनते हैं:- इस सृष्टि में जो उत्पन्न हुआ है उसका नाश भी होना है व दोबारा उत्पन्न होकर फिर से नाश होना है यह क्रम नियमित रूप से चलता रहता है। सृष्टि के इस चक्र से मनुष्य भी बंधा है। इस चक्र की प्रक्रिया से अलग कुछ भी होने से भूत-प्रेत की योनी उत्पन्न होती है। जैसे अकाल मृत्यु का होना एक ऐसा कारण है जिसे तर्क के दृष्टिकोण पर परखा जा सकता है। सृष्टि के चक्र से हटकर आत्मा भटकाव की स्थिति में आ जाती है। इसी प्रकार की आत्माओं की उपस्थिति का अहसास हम भूत के रूप में या फिर प्रेत के रूप में करते हैं। यही आत्मा जब सृष्टि के चक्र में फिर से प्रवेश करती है तो उसके भूत होने का अस्तित्व भी समाप्त हो जाता है। अधिकांशतः आत्माएं अपने जीवन काल में संपर्क में आने वाले व्यक्तियों को ही अपनी ओर आकर्षित करती है, इसलिए उन्हें इसका बोध होता है। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ रही है वे सैवे जल में डूबकर बिजली द्वारा अग्नि में जलकर लड़ाई झगड़े में प्राकृतिक आपदा से मृत्यु व दुर्घटनाएं भी बढ़ रही हैं और भूत प्रेतों की संख्या भी उसी रफ्तार से बढ़ रही है। ——————————————————————— इस तरह भूत-प्रेतादि प्रभावित व्यक्तियों की पहचान भिन्न-भिन्न होती है। इन आसुरी शक्तियों को वश में कर चुके लोगों की नजर अन्य लोगों को भी लग सकती है। इन शक्तियों की पीड़ा से मुक्ति हेतु निम्नलिखित उपाय करने चाहिए। जिस प्रकार चोट लगने पर डाक्टर के आने से पहले प्राथमिक उपचार की तरह ही प्रेत बाधा ग्रस्त व्यक्ति का मनोबल बढ़ाने का उपाय किया जाता है और कुछ सावधानियां वरती जाती हैं। ऐसा करने से प्रेत बाधा की उग्रता कम हो जाती है। इस लेख में भूत-प्रेत बाधा निवारण के यंत्र-मंत्र आधारित उपायों की जानकारी दी गयी है। लाभ प्राप्त करने के लिए इनका निष्ठापूर्वक पालन करें। जब भी किसी भूत-प्रेतबाधा से ग्रस्त व्यक्ति को देखें तो सर्वप्रथम उसके मनोबल को ऊंचा उठायें। उदाहरणार्थ यदि वह व्यक्ति मन में कल्पना परक दृश्यों को देखता है तथा जोर-जोर से चिल्लोता है कि वह सामने खड़ी या खड़ा है, वह लाल आंखों से मुझे घूर रही या रहा है, वह मुझे खा जाएगा या जाएगी। हालांकि वह व्यक्ति सच कह रहा है पर आप उसे समझाइए- वह कुछ नहीं है, वह केवल तुम्हारा वहम है। लो, हम उसे भगा देते हैं। उसे भगाने की क्रिया करें। कोई चाकू, छूरी या कैंची उसके समीप रख दे और उसे बताएं नहीं। देवताओं के चित्र हनुमान दुर्गा या काली का टांग दें। गंगाजल छिड़ककर लोहबान, अगरबत्ती या गूग्गल धूप जला दें। इससे उसका मनोबल ऊंचा होगा। प्रेतात्मा को बुरा भला कदापि न कहें। इससे उसका क्रोध और बढ़ जाएगा। इसमें कोई बुराई नहीं। घर के बड़े-बुजुर्ग भूत-प्रेत से अनजाने अपराध के लिए क्षमा मांग लें। निराकारी योनियों के चित्र बनाना कठिन होता है। यह मृदु बातों तथा सुस्वादुयुक्त भोगों के हवन से शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं। इसके पश्चात आप पीपल के पांच अखंडित स्वच्छ पत्ते लेकर उन पर पांच सुपारी, दो लौंग रख दे तथा गंगाजल में चंदन घिसकर पत्तों पर (रामदूताय हनुमान) दो-दो बार लिख दें। अब उनके सामने धूप-दीप और अगरबत्ती जला दें। इसके बाद बाधाग्रस्त व्यक्ति को छोड़ देने की प्रार्थना करें। ऐसा करने से प्रेतबाधा नष्ट हो जाती है। . यदि आप या आपके परिवार का कोई सदस्य इस तरह की गम्भीर समस्या की चपेट में है जिसका स्वास्थ्य दिन ब दिन गिरता जा रहा हो या उपरोक्त दिए गए लक्षण आप से मिलते जुलते हों तो अपनी कुंडली अनुसार शीघ्र उपाय करवाकर समय रहते इन समस्याओं से छुटकारा पा लें। (2): लग्न की पत्नी ========== लग्न का मतलब व्यक्ति और सप्तम उसकी पत्नी.यह एक सीधा सा ज्योतिषीय सिद्धांत है तथा प्रचलित में है. लेकिन अध्यात्मिक तरीके से अध्यन व ध्यान दिया जाए तो लगता है सप्तम युहीं नहीं मारक कहलाता है. क्यूंकि लग्न प्रातः उदय है तो सप्तम अस्त है.इसलिए कहा जा सकता है कि सप्तम और लग्न जन्म-मृत्युतुल्य भाव हैं. एक बात समझने वाली है सप्तम शोध भी है.यदि अष्टमेश इस भाव में है तो भले ही पत्नी के लिए खराब है लेकिन यदि शनि-गुरु जैसे अष्टमेश इस भाव में हैं तो व्यक्ति को गूढ़ व अध्यात्म का ज्ञानी बनाते हैं.
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