
*||| ग्रहो से सम्बंधित कारक फल |||* 〰〰〰🌷〰〰🌷〰〰〰 ...
*||| ग्रहो से सम्बंधित कारक फल |||* 〰〰〰🌷〰〰🌷〰〰〰 ग्रहो से सम्बंधित भाव/फ़ल के कारक.. क्याँ होता है..⁉ पहले यह बात जानना जरुरी है । नवग्रहों में कोई न कोई ग्रह किसी न किसी विषय से सम्बंधित, संबंधी जिवंत-व्यक्तिजन, तत्व, आदि का कारक होता है। जो ग्रह जिस विषय से सम्बंधित कारक होता है, उस विषय का विचार ..उस कारक ग्रह से उस विषय के सम्बन्ध में विचार किया जाता है। 🔺 *"गुरु"* ज्ञान, देव-कृपा, वृद्ध जनों का सुख़ और सहयोग, दादा से स्नेह, धार्मिक कृत्य, शिक्षण-विध्या-ग्यान आदि विषयो का कारक है। जब गुरु बलवान होगा तब गुरु से सम्बंधित इन सभी विषयो के शुभ फलो की प्राप्ति में वृद्धि होगी। जब जातक का गुरु कमजोर, ज्याँदा से ज्याँदा पाप पीड़ित होगा तब, इन सब शुभ फलो में कमी अभाव रहेगा । इसी तरह जो भी ग्रह जिस विषय से सम्बंधित विषय का कारक होता है । सबंधित ग्रह के कारक फ़ल, उस ग्रह के शुभ-अशुभ, बली और कमज़ोर वि. स्थिति पर निर्भर रहते है । 🔺 *"शुक"*: प्रेम, पत्नी, सुंदरता, काम-शक्ति, सांसारिक भोग विलास आदि का कारक है। वैवाहिक जीवन का विचार सप्तम भाव से किया जाता है । *सप्तम भाव का कारक, पुरुष के लिए शुक्र..* *और स्त्री जातिका के लिए गुरु होता है।* 🔺 अब सप्तम भाव् का स्वामी बलवान होकर शुभ प्रभाव में होने से वैवाहिक जीवन ठीक चलता रहेगा क्योंकि सप्तम भाव, सप्तमेश, दोनो शुभ प्रभाव युक्त है लेकिन.. 🔺 यदि सप्तम भाव का कारक पुं.जातक के, लिए.. *"पत्नी कारक शुक्र"* बहुत कमजोर.. या पाप ग्रहो से पीड़ित हो तो शादी हो जाने के बाद भी, पुंरुष जातक को पत्नी के सुख़, सहयोग, ओर मनमुटाव में कमी ही रहेगी । 🔺 बिलकुल इसी तरह स्त्रियों की कुंडली में, पति-कारक गुरु की स्थिति बहुत कमजोर, पीड़ित होने से और दुसरी ओर *सप्तम भाव, सप्तमेश के शुभ प्रभाव में होनेसे शादी तो ठीक चलती रहेगी* लेकिन कही न कही, पति की ओर से सहयोग और सुख में जातिका को कमी बनी रहेगी । 🔺 इसी तरह जिस विषय-संबंधी आदि से सम्बंधित कारक ग्रह बहुत कमजोर या बहुत पाप पीड़ित होगा, जातक को उस ग्रह के "कारक" संबंधीत फल में कमी बनी रहेगी । 🔺 जिन कारक ग्रह से सम्बंधित फल में कमी बनी रहती है उन कारक ग्रह की शुभता और उनको उपायो द्वारा बलवान बनाकर ऐसे कारक सम्बंधित ग्रह के ज्यादा से ज्यादा पूर्ण फल प्राप्त किये जा सकते है। *-हरिः ओउःम्🔔*
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