
प्रेम_सम्बन्ध जब दो प्रेमियो के बीच अन्तर्मन् से ज...
प्रेम_सम्बन्ध जब दो प्रेमियो के बीच अन्तर्मन् से जो एकदूसरे के लिए मोह उत्पन्न होता है तो उसकी जो अनुभूति होती है उसे मूल रूप से प्रेम सम्बन्ध कहा जाता है।प्रेम किसी के साथ भी हो सकता है।प्रेम के कई रूप होते है।यहाँ बात दो प्रेमी-प्रेमिका के विषय में कर रहा हूँ।किसी को प्रेम में सुख मिलता है और वह प्रेम सम्बन्ध विवाह सम्बन्ध में बदल जाता है तो किसी को प्रेम में दुःख, धोखा भी मिलता है जिसका अंत दुखद और दुखद परिणाम देने वाला होता है जन्मकुंडली का पाचवां भाव प्रेम संबंधो का होता है।लड़के की कुंडली में शुक्र चंद्र और लड़की की कुंडली में मंगल चंद्र प्रेम के कारक होते और प्यार के लिए उत्साहित करते है साथ ही पंचम भाव के स्वामी जिसे पंचमेश कहते है इसकी स्थिति प्रेम संबंधो की मजबूती को दर्शाती है।चंद्र का योगदान प्रेम के छेत्र में इस कारण से है क्योंकि चंद्र मन का कारक है जब तक मन में प्रेम उत्पन्न नही होगा तब तक प्रेम सम्बन्ध या कोई भी सम्बन्ध नही सुचारू रूप से नही चल सकता।जब पंचमेश या पंचम भाव से किसी भी तरह से लड़के/पुरुष की कुंडली में बली शुक्र से सम्बन्ध होता है तो जातक का प्रेम सम्बन्ध बनता है और लड़की/स्त्री की कुंडली में मंगल से होने पर प्रेम सम्बन्ध बनता है।जब शुक्र मंगल के साथ प्रेम संबंधो में चंद्र का भी युति/दृष्टि सम्बन्ध बन जाता है तो ऐसे जातक/जातिका प्रेम संबंधो में काफी गंभीर और गहराई से जुड़े होते है।कोई शुभ ग्रह पंचमेश होकर पंचम भाव को देखता है तो प्रेम सम्बन्ध बनते है लेकिन् यदि इस स्थिति में पंचमेश को चंद्र मंगल शुक्र का सहयोग न मिल रहा हो तब यह प्रेम सम्बन्ध बहुत गहराई से दिल से जुड़े नही होते। *प्रेम संबंधो में सुख/दुःख-सफलता/असफलता* प्रेम संबंध सफल है या असफल हो जाता है इसके पीछे भी ग्रह योग जिम्मेदार होते है।पंचमेश, पंचम भाव शुक्र मंगल पर सूर्य शनि राहु केतु का प्रभाव प्रेम संबंधो में परेशानिया देता है।पंचम भाव, पंचमेश सहित लड़के/ पुरुष की कुंडली में शुक्र पर और लड़की/स्त्री की कुंडली में मंगल पर शनि राहु केतु का एक साथ युति दृष्टि प्रभाव प्रेम संबंधो को ख़राब करता है ऐसे जातक/जातिका के बीच पाप ग्रहो के कारण अपने प्रेमी/प्रेमिका से अलग होना पड़ता है या धोका मिलता है।शनि राहु केतु के साथ साथ यदि पंचमेश या पंचम भाव से कोई अशुभ योग बना होता है तो ऐसे जातक/ जातिका को धोका मिलता ही मिलता है जिसकी समाप्ति दुःख के रूप में होती है।सूर्य के प्रभाव से प्रेम संबंधो में कलह की स्थिति बनी रहती है।राहु केतु के प्रभाव से प्रेमी-प्रेमिका के बीच वैचारिक मतभेद बने रहते है जिससे उनके बीच तनाब, आपस में दुरिया बनने लगती है शनि का प्रभाव भी राहु केतु सहित पंचमेश पंचम भाव पर होने से प्रेमी प्रेमिका में अलगाब हो जाता है इस स्थिति के साथ यदि पंचमेश पंचम को देख रहा हो या बलवान होकर शुभ प्रभाव में हो बलवान शुभ बृहस्पति की दृष्टि पंचम भाव पंचमेश पर होने से अलगाब की स्थिति में कमी आ जाती है और सम्बन्ध चलता रहता है। पंचमेश पंचम भाव, प्रेम संबंधी कारक ग्रह का पाप ग्रहो, अस्त ग्रहो के प्रभाव से मुक्त होना, प्रेम संबंधी भाव भावेश ग्रहो का बली होना, शुभ प्रभाव में होने, अस्त न होना आदि शुभ स्थितियां होने से प्रेम संबंधो में सुख, सहयोग और स्थायित्व रहता है ज्यादा से ज्यादा शुभ ग्रहो गुरु शुक्र चंद्र और मंगल का आपसी अच्छा तालमेल प्रेम संबंधो को सुखद और सफल बनाता है। प्रेमसंबंध ग्रह योग/भाव भावेश/कारक ग्रहो जब पाप ग्रहो शनि राहु केतु के प्रभाव से मुक्त होते है पंचमेश/प्रेम संबंधी कारक ग्रह अस्त न हो, राशि अंशो में कमजोर न होने से प्रेम सम्बन्ध सफल रहते है।
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