
*सुखद दांपत्य के विघटनकारी योग तथा वैवाहिक विघटन औ...
*सुखद दांपत्य के विघटनकारी योग तथा वैवाहिक विघटन और मंत्र की समाधानात्मशक्ति* *पक्षी एक-एक तिनका-तिनका सवार सवार कर अपना घोंसला बनाता है अपने संसार की त्रिज्या उसी से प्रारंभ करता है और परिधि को उसी में खींच लाता है , लेकिन जब वह घोंसला छिन्न-भिन्न होता है तब उसकी पीड़ा असहनीय हो जाती है वस्तुतः मानव जीवन की भी यही स्थिति है। जीवन यदि सूदिर्घ स्वप्न है तो विवाह वह सर्वोत्तम स्वप्नांश है जिस में काम और रति आनंद बिंदुओं में भोगते हैं किंतु कभी-कभी यह सुख संदेह क्लेस और पार्थक्य के के सुलगते रास्तों पर चल पड़ता है , परिणय के चंद्र को विच्छेदन कर राहू ग्रस्त लेता है फलतः सारे स्वप्न तिमिर के महासागर में तिरोहित हो जाते हैं ।* *आज मैं कुछ ऐसा बताने का प्रयास कर रहा हूं जिन में से किसी एक की भी जनमांग में उपस्थिति दांपत्य सुख की क्षति कर देता है।* *वैवाहिक जीवन में शुक्र का सर्वाधिक महत्व ह शुक्र सौंदर्य काम व यौन संबंधों का प्रतिनिधि है ।आदर्श एवं सुखी वैवाहिक जीवन के लिए शुक्र का निर्दोष होना अति आवश्यक है अन्यथा शुक्र की युति पापी ग्रहों के साथ होने से अत्यंत विघटनकारी परिणाम सामने आते हैं विशेषत: शुक्र मंगल, शुक्र शनि, शुक्र राहु , की युति वांछनीय नहीं है ।इन युतिओं से शुक्र पापी ग्रहों के कुचक्र में फंस जाता है ऐसे व्यक्ति अत्यधिक कामुक होते हैं वासना के वेग में इनका विवेक बह जाता है । राहु या केतु की युति शुक्र के साथ होने पर इस क्षेत्र में भीषण अपवादों का सामना करना पड़ता है । ऐसे जातकों का जीवन नारकीय हो जाता है ।* *पुरुषों की कुंडली में शुक्र और स्त्रियों की कुंडली में मंगल की स्थिति निश्चित ही बहुत महत्वपूर्ण है । यदि बच्चे की कुंडली में ऐसे योग हो तो दुष्परिणामों से बचने के लिए ज्योतिष का सहारा अवश्य लेना चाहिए ऐसे जातकों का लालन-पालन संतुलित मर्यादित और अनुशासित वातावरण में होना चाहिए उस तरह ऐसा विघटन अपना क्रियात्मक रूप सामने नहीं ला पाता है।* *हमारे विचार से अष्टम भाव से काम व यौन सुखों के बारे में विचार करना चाहिए । लड़की की कुंडली का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाव यही है सप्तम भाव कितना ही श्रेष्ठ क्यों ना हो यदि अष्टम भाव पापी ग्रहों से किसी प्रकार प्रभावित है तो योन विकृतियां और रोग निश्चित रूप से हो जाते हैं । जैसे अष्टम भाव में मंगल और लग्न कुंभ या मिथुन ना हो तो मंगल दोष के कारण विषम असंगतियां जीवन में देखी गई हैं। आठवें भाव में शुक्र मंगल, राहु मंगल , शनि मंगल , शनि शुक्र , राहु शुक्र आदी हो तो निश्चित रुप से यौन संबंध सहज एवं सुखकर नहीं हो सकता है।* *द्वादश भाव सैया सुख के लिए विचारणीय है पर द्वादशेश का अपना फल कुछ नहीं होता है सदैव अपनी स्थिति व दूसरी राशि के अनुसार फल प्रदान करता है।* *संक्षिप्त भाव विवेचन के उपरांत अब सूत्र शैली में कुछ योगों का उल्लेख करते हैं-* *चंद्रमा और शुक्र में से कोई सप्तमाधिपति हो भया सप्तम स्थान में स्थित राशि इन ग्रहों का उच्च स्थान हो या दोनों ग्रह सप्तम भाव में स्थित होकर कसरत तो हो गए हो तो निश्चित रुप से वैवाहिक जीवन दुश्चिंता के भीषण झंझावातों से घिरा होता है । पुरुष जातक की कुंडली में ऐसा योग दो विवाह की संभावना जगाता है।* *वासना का संयम मनुष्यता का लक्षण है । इस की विकृति इंसान को पशु बना डालती है। यदि शुक्र और चंद्रमा वृषभ तुला कर्क के नवमांश में सप्तमेश के साथ मतलब राहु शनि के साथ स्थित हो तो जातक वासना में अंधा हो जाता है । वह पशुवत आचरण करता है वह क्रूरता में आनंद मानते हैं ।और यदि बृहस्पति इस योग को पूर्ण दृष्टि से देखता है तो उच्च कक्षा के व्यक्ति से संबंध स्थापित होता है ।यदि शनि की दृष्टि हो तो निकृष्ट कोटी के व्यक्ति से दैहिक सूत्र जोड़ता है प्रायः ऐसे योग के जातक अधिनस्थ या विवश व्यक्ति के साथ संबंध स्थापित कर लेते हैं । यदि इस योग पर मंगल की दृष्टि हो तो।* *शुक्र मिथुन राशि गत हो या मिथुन नवमांश में हो तो दो विवाह होते हैं यह योग मंगल शनि या राहु से दृष्ट होने पर चारित्रिक सन्देह उत्पन्न करते हैं लग्न में शनि वृश्चिक राशि गत हो और मंगल सप्तम भाव में बैठकर शनि से दृष्ट हो तो वासनात्मक जीवन माया पूर्ण होता है द्वादश भाव चरित्र अभिज्ञान का प्रबल स्रोत है। द्वादश भाव में चंद्रमा हो तो चरित्र की स्वच्छता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है शनि मंगल का प्रभाव द्वादश भाव पर हो अथवा स्थित हो या परस्पर दृष्टि हो तो जाति का घोर चरित्रहीन होती है यदि चंद्र और शुक्र बली होकर चतुर्थ पंचम व्याश सप्तम भाव में स्थित हो तो अन्य समस्त पक्षों की उत्कर्ष दशा होने पर भी वासना जातिका की सबसे प्रबल दुर्बलता होती है।* *सिद्धांत और आदर्श का हठ भी जीवन की सहजता को बाधित करता है शुक्र यदि कर्क राशि या उसके नवांश में हो तो ऐसी स्थिति आ जाती है प्रायः विवाह भी नहीं हो पाता है।* *सप्तम भाव में सूर्य की राशि एवं शुक्र की स्थिति वैवाहिक जीवन को क्लेषित करती है । यदि हीनबली सप्तम अधिपति स्त्री की कुंडली में नवम भाव में हो तो विवाह के पूर्व या पश्चात संबंध विच्छेद हो जाता है । शनि लग्न या सप्तम भाव में हो और यह भाव पापकर्तरी योग ग्रस्त हो तो अनिच्छा से विवाह करना पड़ता है अंतरजातीय विवाह शनि केतु या शुक्र की युति और सप्तम भाव से संबंध स्थापन के कारण होता है।* *विलंब से विवाह होना प्रायः अभिभावकों और विशेषकर लड़कियों के लिए चिंता का कारण बन जाता है सप्तमाधिपति अष्टम भाव में हो तो विवाह में समस्याएं सामने आती हैं सप्तमेश यदि अष्टम भाव में स्थित हो तो विवाह में भारी विसंगति होती है इस गंभीर स्थिति से बृहस्पति की दृष्टि भी संपूर्णत: उबार नहीं पाती है। सप्तमाधिपति सूर्य अष्टम भाव में और पाप ग्रह ग्रस्त हो स्थानांतरित हो और लग्न कुंभ हो तो विवाह सुगमता से संपन्न नहीं होता है।* *अवैध संबंध विश्वास का गला घोटकर आत्मीयता को शव बना डालते हैं ।पंचमाधिपति दुर्बल हो या पंचम भाव दोषपूर्ण हो तथा सप्तमाधिपति अष्टम या द्वादश भाव में स्थित हो तो विवाह से पूर्व और पश्चात अवैध संबंध स्थापित होते हैं कन्या लग्न में जन्मे जाति का के जन्मांक में बुध मीन राशि स्थित होकर सप्तम अस्त हो तथा शुक्र अष्टम अस्त हो तो वह अपने पति से घृणा करती है बुध और शुक्र क्रमशः सप्तमस्थ और अष्टमस्थ हों तथा इनमें किसी के साथ सूर्य संयुक्त हो अर्थात लग्न मकर हो तो जातिका पति से दैहिक समागम किए बिना उसे त्याग देती है । द्वितीयेश अशुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो अथवा सप्तमेश लग्नस्थ हो तो चरित्र शंका जनक होता है । मंगल बुध और शुक्र सप्तम अस्त हो और अशुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक प्राकृतिक साधनों से अपनी वासना की शांति करता है। सूर्य दुषित होकर सप्तम अस्त हो तो बांझ औरत से सप्तमस्थ हो तो निम्न कोटि की महिलाओं से अवैध संबंध स्थापित होता है ।एवं द्वादश भाव में पाप ग्रह हो तो वैवाहिक जीवन में असंतोष एवं भिन्नता का सूत्रपात होता है इस योग की तीक्ष्णता ग्रहाधिन हैं । पर सप्तम सप्तमेश के अतिरिक्त यदि लग्न दुष्ट ग्रहों से संबंधित है तब वैवाहिक जीवन अपूर्ण रहता है ऐसी स्थिति में विवाह नहीं होता है।*
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