
सभी माता बहने माफ़ कर हमारा ईरादा गलत नही है परन्तु...
सभी माता बहने माफ़ कर हमारा ईरादा गलत नही है परन्तु ये जानकारी आवश्यक हैं !! नर-नारी रति के भेद !! ~ तंत्र में रतिक्रीड़ा का बहुत महत्व है, यहाँ शारीरिक रति को महत्व नहीं दिया जाता, तंत्र ऊर्जा तरंगों की रति को महत्व देता है , जिसके भावों में प्रत्येक बार अंतर होता है और भावो के अनुसार ऊर्जा तरंगें भी भिन्न होती हैं, तंत्र का मानना है की एक जोड़े की विभिन्न समय में की गयी एक ही प्रकार की रति के प्रकारों में अंतर होता है, तंत्र में रति को विभिन्न दृष्टियों से विभिन्न प्रकारों में विभाजित किया गया और तदारुरूप उनके गुण-दोषों को परिभाषित किया गया है !! *१.आत्मिक रति* ~ जब कोई स्त्री-पुरुष का जोड़ा एक दुसरे के प्रति उदात्त आकर्षण से युक्त होता है और दोनों एक दुसरे के प्रति प्रगाढ़ आत्मिक सम्बन्ध की अनुभूति करते हैं , तो उन दोनों में एक आत्मिक सम्बन्ध बन जाता है, वस्तुतः यह आत्मिक सम्बन्ध विशुद्ध चक्र की ऊर्जा तरंगों द्वारा बनता है |ऐसे सम्बन्ध भाव से एक-दुसरे के आकर्षण में व्याकुल स्त्री-पुरुष जब अपने प्रियतम और प्रिया के प्रणय भाव में सुधि विहीन हो जाते हैं , तो यह आत्मिक रति कहलाता है, इस रति में शारीरिक मिलाप हो यह आवश्यक नहीं है, यह स्त्री-पुरुष के दूर-दूर रहने पर भी होती है, इस रति में केवल ऊर्जा तरंगें एक दुसरे की ऊर्जा तरंगों को प्रभावित करती हैं और उनमे ही रति होती है !! *२.मानव रति* ~ इस रति में भी पहले विशुद्ध चक्र की तरंगों का मिलन होता है और युवक -युवती एक दुसरे के प्रति उदात्त प्रेम भाव के क्रीड़ा करते हैं , परन्तु बाद में मूलाधार की ऊर्जा की तीव्रता बढ़ जाती है और रति शारीरिक स्तर पर होने लगती है, ऐसी रति भी तभी संभव है जब स्त्री- पुरुष का एक दुसरे के प्रति अपनापन और प्रेम हो इसमें आपसी स्वार्थ और शारीरिक संतुष्टि के लिए रति को शामिल नहीं माना जाएगा , उनका वर्गीकरण भिन्न प्रकार से होता है और वह या तो कृत्रिम रति होती है या पशु रति, जिनके बारे में आगे लिखा जायेगा !! *3.मानसिक रति* ~ इस रति में स्त्री , पुरुष के साथ और पुरुष , स्त्री के साथ मानसिक रूप से रति करते हैं , पर शारीरिक मिलाप नहीं होता जैसे कोई पुरुष किसी युवा कामिनी को देखकर उसके प्रति कामभाव से युक्त हो जाता है वह स्त्री उसे प्राप्य नहीं है , यह वह जानता है , परन्तु वह अपनी कामना के वशीभूत कोकर मानसिक स्तर पर उससे कल्पना में शारीरिक रति करता है कोई युवती किसी पुरुष के प्रति कामासक्त है , परन्तु वह लज्जा या सामाजिक मर्यादा के कारण उससे शारीरिक रति नहीं कर सकती तब वह कल्पना की शारीरिक रति करती है, ऐसी रति में दुसरे पक्ष की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती, पर यदि दोनों पक्ष ऐसी रति में एक ही समय में एक-दुसरे के प्रति मानसिक रति में निमग्न हों , तो दोनों का रति सुख बढ़ जाता है और खिन्नता या उदासी या निस्तेजता का प्रकोप नहीं होता, स्वप्न दोष , स्वप्नक्रीडा आदि ऐसी ही रति के परिणाम हैं, जब पुरुष या स्त्री किसी के प्रति कामासक्त हो मानसिक रति में निमग्न हो , उसी समय दूसरा पक्ष अगर नफ़रत की भावना रखे तो सुख प्राप्ति में कमी आती है और बार बार मन भटकता है |यह उच्च स्तर की मानसिक तरंगों का विज्ञान है !! *4.राक्षस रति* ~ इस रति में पुरुष कामुक होकर पशु भाव से नारी के साथ छेड़छाड़ करता है और उसकी इच्छा के विपरीत उससे रति करता है, इसमें नारी को अत्यधिक कष्ट होता है, यह रति राक्षस रति है, आज के युग के अनुकूल शब्दों में यह बलात्संग है, इस बलात्संग के अंतर्गत पति-पत्नी की रति भी है, यदि पत्नी की इच्छा न हो और पति जबरदस्ती रतिक्रिया करे, यह रति आज आम हो रही है, इसका कारण विवाह हो जाना किन्तु मानसिक तालमेल और आकर्षण न उत्पन्न हो पाना होता है, कभी कभी पत्नी के कोई राज खुलने पर पति इस तरह से भी उसके प्रति कठोर हो जाता है , जबकि वह अपनी भावना न व्यक्त करता है न कहता है !! *-:विवाह और आत्मा युगल की अवधारणा तथा अंतर्संबंध ( एक सोच )* यह ब्रह्माण्ड एक निर्विकार -निर्गुण परम तत्व से उत्पन्न होता है और उसी में समाहित होता है , इसे सदाशिव-परमेश्वर-परब्रह्म-परम तत्व आदि के नाम से जाना जाता है, इस तत्व से जब सृष्टि उत्पन्न होती है तो वह द्विगुणात्मक हो जाती है , अर्थात शिव , अर्धनारीश्वर हो दो गुणों का प्रतिनिधित्व करने लगते हैं , एक धनात्मकऔर दूसरा ऋणात्मक, , इसीलिए सम्पूर्ण प्रकृति द्विगुणात्मक होती है, स्त्री ऋणात्मक ऊर्जा और पुरुष धनात्मक ऊर्जा का प्रतिरूप होता है, समस्त संसार की उत्पत्ति इस धनात्मक और ऋणात्मक के आपसी संयोग से होती है , मनुष्यों में भी ऐसा है , किन्तु मनुष्यों में विवाह की अवधारणा है, जबकि प्रकृति के अन्य किसी जीव या पदार्थ में यह व्यवस्था नहीं है, अर्थात यह मनुष्य द्वारा अपने लिए बनाई गये नियम है !!
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