
सर्प से निर्भय रहने और भगाने का मंत्र- आपको आश्चर...

सर्प से निर्भय रहने और भगाने का मंत्र- आपको आश्चर्य होगा, यह जानकर कि साँप सुन नहीं सकता, क्योंकि इसके कान ही नहीं होते हैं, बीन द्वारा सपेरा हमेंभिरम में रखने हेतु साँप के आगो बीन बजाता है ! आपने यह भी देखा होगा, कि सपेरा बीन बजाने के दौरान साँप को बीच-बीच में हाथ मारकर साँप को क्रोध दिलाता है, ताँकि साँप अपना फन उठाकर रखे, बस सपे की यही चाल कामयाब हो जाती है तथा आसपास खड़े व्यक्ति समझते हैं कि साँप बीन पर नाच रहा है ! किंतु एक नाम ऐसा है, जिसे यदि सर्प अथवा साँप के आगे उच्चारित कर लिया जाए, निश्चय ही साँप वहाँ से दुम-दुमाकर भाग खड़ा होगा ! जी हाँ ! यह बिल्कुल सच्च है, चाहे तो कभी परिक्षा करके स्वयँ ही इस सच्चाई की पुष्टि कर सके हैं ! इसी संदर्भ में एक प्रसंग प्रस्तुत है, जिसमें आपको यह भी ज्ञात हो जाएगा कि किसका नाम सेनो से सर्प वापिस भाग जाता है ! अर्जुन के पौत्र अर्थात अभिमन्यु के पुत्र 'राजा परिक्षित' ने एक बार कलियुग के प्रभाव से एक मरा हुआ सर्प ध्यान मग्न एक ऋषि के गले में डाल दिया था ! जिससे ऋषि पुत्र ने क्रोधित होकर यह श्राप दे डाला कि -'जिसने भी मेरे पिता के गले में यह मरा हुआ साँप डाला है, आजसे सातवें दिन 'तक्षक नाग' के डसने से उसकी मृत्यु होगी ! ठीक सातवें दिन तक्षक नाह ने राजा परिक्षित को डस लिया, जिससे उनकी तत्काल मृत्यु हो गयी ! राजा परिक्षित की मृत्यु का प्रतिशोध लेने हेतु परिक्षित के पुत्र 'राजा जन्मजेय' ने सर्प यज्ञ किया, यज्ञ करते समय उच्चारित विशेष मत्रों के प्रभाव साँप स्वत: ही आकर यज्ञाग्नि में गिरकर भस्म होने लगे ! इसे नागलोक में हाहाकार मच गया तथा नाग देवता बड़े चिंतित हुए ! तब 'आस्तिक मुनि' ने सर्पों की प्राणरक्षा की थी, तब सर्पों ने आस्तिक मुनि को वचन दिया था कि जो भी आपका नाम लेगा, उसे सर्प नहीं काटेगा ओर तत्काल वापिस चला जाएगा, ओर जो सर्प वापिस न लौटा तो उसी क्षण उसके फन के 'शीशम के फूल' की तरह सैंकट़ो टुकड़े हो जाएँगे !! बस ! तभी से आस्तिक मुनि का नाम लेते ही सर्प तुरंत वहाँ से वापिस भाग खड़ा होता है ! आपको भी कभी सर्प दिख जाए, तो अवश्य यह आजमाकर देखिएगा ! आप आश्चरियचकित हो उठेगें ! चाहे कैसा भी भ्यंकर विषधर कियों न हो, आस्तिक मुनि की "सौगंध" देने से अथवा "मुनिराजं आस्तिकं नम:" मंत्र का उच्चारण करने से वापिस भाग खड़ा होगा ! घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर यदि लाल स्याही से "मुनिराज आस्तिक नम:" लिख देने से घर में सर्प(साँप) प्रवेश नहीं कर सकता है ! सोते समय यदि "मुनिराजं आस्तिकं नम :" का एक बार उचिचारण कर लिया जाए, तो व्यक्ति सर्प भय से मुक्त रहता है !
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