
मंगल दोष/मांगलिक मंगल दोष/ मांगलिक , वो जातक कहला...

मंगल दोष/मांगलिक मंगल दोष/ मांगलिक , वो जातक कहलाता है जिसके लग्न कुंडली में प्रथम भाव , दूसरे भाव , चतुर्थ भाव , सप्तम भाव , अष्टम भाव एवम द्वादश भाव यानी मंगल की स्थिति लग्न कुंडली (D-1) में लग्न में , 2 , 4 , 7, 8, & 12 भाव में स्थित होता है मगर डॉ बी वी रमन जी एवम अन्य ज्योतिषी विद्वानों ने, बहुत सारे लग्नो में मंगल की स्थिति अलग अलग भावो में , उच्च के मंगल को , नीच के मंगल को , गुरु मंगल की युति , मंगल चंद्र की युति , मंगल पर चंद्र की दृस्टि यानी समसप्तक होना एवम मंगल एवम गुरु का सम सप्तक होना या गुरु की दृस्टि , मंगल पर होना , ऐसे जातक को मांगलिक दोष पीड़ित नहीं कहा या इनके मंगल दोष के प्रभाव को कम बताया या मंगल दोष के प्रभाव को निष्फल बताया मगर मेरी शौधं में कोई भी शुभ ग्रह अपनी शुभता को नहीं छोड़ता है एवम अशुभ/पापी/क्रूर ग्रह , अपनी अशुभता को नहीं छोड़ता है मंगल दोष/मांगलिक/अंगारक दोष में , वैवाहिक जीवन को ख़राब बताया मगर मेरी शौधं में वैवाहिक जीवन में अलगाव होना या वैवाहिक जीवन में कटुता होना या किसी जातक का विवाह देरी से होने में केवल अकेले मंगल को नहीं पाया अपितु मेने 50 से भी ज्यादा ग्रहो की स्थिति या ग्रहो के नक्स्त्र स्वामी की स्थिति एवम वैवाहिक जीवन के कारक शुक्र एवम अंशो के आधार पर , वैवाहिक जीवन के कारक जिसको दारा कारक कहते हे , की स्थिति , शुक्र ग्रह एवम दारा कारक का पाप ग्रह से युति या दृष्ट होना , नवमांश कुंडली D-9 , के लग्न एवम लग्नेश या फिर D1 के सप्तमेश या सप्तम भाव की स्थित , लग्न कुंडली या नवमांश कुंडली में , त्रिक भावो या कन्या , वरश्चिक राशी या मीन राशि में स्थिति या फिर लग्न कुंडली के सप्तमेश का नवमांश कुंडली में पाप ग्रहों से युति या दृष्ट होना या सप्तमेश एवम अष्टमेश का नवमांश कुंडली में बुध की राशियों कन्या या मिथुन में स्थित होना एवम अनेक योगों का , जिनका मेने , मेरे शौधं पेज से पूर्व में एक लेख लिख चुका हूं , उन योगों या ग्रहो की स्थिति के कारण या तो विवाह में विलम्ब या वैवाहिक जीवन में अलगाव या वैवाहिक जीवन का ख़राब होने के मुख्य कारण , इस मेरे शौधं लेख में उलेख किया अतः मेने केवल कभी भी मंगल दोष या अंगारक दोष जो मंगल का राहु या केतु की युति से बनता है , केवल उसके कारण वैवाहिक जीवब के मामलो में दोषी नहीं ठहराया मंगल यदि वैवाहिक जीवन में दोष कारक है तो मेरी शौधं में मैने डी27 एवम डी 60 का उपयोग किया एवम शौधं में पाया कि , यदि इन दोनों सब डिविजनल चार्टों में , मंगल किसी भी प्रकार से वैवाहिक जीवन में किसी भी तरह से जातक को तकलीफ नहीं दे रहा है तो जो लग्न कुंडली डी1 चार्ट में मंगल के द्वारा जो मांगलिक दोष का निर्माण हुवा हे , वो मंगल दोष , निष्फल हो जाता है मगर एक इसके लिए शर्त है कि जातक जिसमे दोनों वर्गों के शामिल है , उनका जन्म समय शुद्ध हो /सटीक हो बहुत सारे ज्योतिषियों ने वैवाहिक जीवन में अलगाव को या वैवाहिक जीवन का ख़राब होना या देरी से विवाह होना , मंगल को अकेले दोषी ठहराते हे उसके चलते , विवाह के समय गुण मिलान करते हे और मंगल दोष का परिहार भी देखते है मगर मेरे ज्योतिष जीवन के प्रक्टिकल अनुभवों में मंगल के परिहार के बावजूद भी , कई वैवाहिक जोड़ो में अलगाव होकर रहा या निष्फल/ख़राब वैवाहिक जीवन रहा और मेरे अनुभवों में यह भी पाया कि एक वैवाहिक युगल में से एक को मंगल दोष है एवम एक को नहीं , फिर भी एक सफल वैवाहिक जीवन को जीते हुवे एवम भारतीय परंपरा के मुताबिक , उचित उम्र में विवाह बंधन में बंधता हुवा देखा।
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